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प्रदूषण कई गंभीर बीमारियों के साथ-साथ आंखों की रौशनी भी छीन सकता है, पढ़िए कैसे

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गाड़ियों और उद्योगों से होने वाले धुएं के साथ मौसम की स्थिति ने दिल्ली की हवा की गुणवत्ता पर दुष्प्रभाव डाला है। पिछले कुछ हफ्तों में दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के अन्य हिस्सों में वायु प्रदूषण के स्तर में खतरनाक वृद्धि देखी गई है। हर साल होने वाली इस घटना में, प्रदूषण के स्तर में वृद्धि अलग-अलग कारकों का परिणाम है – पराली जलाने और वाहनों से होने वाले प्रदूषण से लेकर दिवाली के दौरान पटाखे फोड़ने और यहां तक कि जलवायु परिवर्तन भी शामिल है। एनसीआर में हवा की गुणवत्ता में इस मौसमी गिरावट से रेटिना की समस्या हो सकती है और आंखों की रोशनी कम होने की दर बढ़ सकती है।

यूके के एक बायोबैंक स्टडी के अनुसार, वायु प्रदूषण दृष्टिदोष के बढ़ने के जोखिम और अपरिवर्तनीय दृष्टि हानि से जुड़ा है, जिसे उम्र से संबंधित मैक्यूलर डिजनरेशन (एएमडी) के रूप में जाना जाता है। 4 लोकल सर्किल्स के एक हाल की स्टडी के अनुसार, वायु प्रदूषण के गंभीर स्तरों को चिहिन्त करने वाले 445 के औसत एक्यूआई के साथ, पिछले महीने में एक हफ्ते के दौरान प्रदूषण से संबंधित परेशानियां 22% से बढ़कर दोगुनी 44% हो गई है।

वायु प्रदूषण का आंखों पर प्रभाव

लंबे समय तक प्रदूषित हवा के संपर्क में रहने से आंखों की सेहत और रोशनी पर गंभीर एक्यूआई का हानिकारक प्रभाव पड़ता है, इससे आंखों में दर्द, धुंधली दृष्टि, पानी, जलन, ड्राई आई सिंड्रोम और यहां तक कि ग्लूकोमा भी होता है। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड-दो सामान्य वायु प्रदूषकों के संपर्क में आने वाले लोगों में एएमडी विकसित होने का जोखिम काफी ज्यादा होता है। लोगों में एएमडी जैसी पुरानी रेटिनल बीमारियों के विकसित होने का एक प्रमुख कारण वायु प्रदूषण का अत्यधिक उच्च स्तर और बिगड़ती वायु गुणवत्ता है। आंख के मैक्यूला में मौजूद छोटी कोशिकाएं पार्टिकुलेट मैटर के लिये बेहद संवेदनशील होती हैं। 2 पार्टिकुलेट मैटर के उच्च घनत्व के साथ प्रदूषित हवा में आंखों के लंबे समय तक संपर्क में रहने से प्रौढ़ और वृद्ध लोगों में एएमडी की समस्या बढ़ जाती है। इसलिये, एमएमडी2 के बढ़ने या बिगड़ने को रोकने के लिये अपनी आंखों को प्रदूषित हवा से बचाना बेहद जरूरी है।

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डॉ. महिपाल सचदेव, मेडिकल डायरेक्टर एवं चेयरमैन,सेंटर फॉर साइट ग्रुप ऑफ आई हॉस्पिटल्स नई दिल्ली के अनुसार, “सुरक्षात्मक वायुमंडलीय यूवी परत के विघटन से एएमडी और आंखों की रोशनी जाने का खतरा बढ़ जाता है। रिसर्च बताते हैं कि उच्च पार्टिकुलेट मैटर (पीएम 2.5) के संपर्क में आने से अपरिवर्तनीय दृष्टिदोष का खतरा जुड़ा है। वहीं अन्य प्रदूषक तत्व, मोटे कणों का छोड़कर, रेटिना की संरचना में बदलाव ला सकते हैं। ऐसे में ना केवल एमएडी के उपचार में देरी करने के लिये सही कदम उठाना जरूरी है, बल्कि प्रीवेंटिव उपाय करना भी जरूरी है।”

नेत्र रोगों का उपचार और प्रबंधन

• प्रीवेंटिव आई केयर, सुरक्षा की पहली पंक्ति है क्योंकि कई नेत्र रोग के कोई लक्षण या संकेत नजर नहीं आते हैं। आंखों की रोशनी कम होने से रोकने के लिए शुरूआती पहचान महत्वपूर्ण है और इसके लक्षणों को पहचानना और नियमित जांच से गुजरना अहम हो सकता है।

• बीमारियों और लक्षणों के बारे में जागरूकता समय पर चिकित्सा सहायता पाने में मदद कर सकती है। एक बार आंख की किसी बीमारी का निदान हो जाने के बाद, नियमित रूप से एक नेत्र रोग विशेषज्ञ से फॉलो-अप लेना महत्वपूर्ण है।

• निर्धारित उपचारों का सख्ती से पालन करने और परामर्श के अनुसार जीवनशैली में बदलाव करने से लोगों को अपनी आंखों की बीमारियों को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी, ताकि उन्हें बेहतर परिणामों का लाभ मिल सके।

अपनी आंखों की रोशनी सुरक्षित रखें

भले ही प्रदूषण के स्तर को नियंत्रित करने के लिए बहुत नहीं किया जा सकता है, ऐसे में आंखों की बीमारियों को दूर रखने के लिये अपनी आंखों की रक्षा करना और अच्छी रेटिनल हाइजीन बनाए रखना महत्वपूर्ण है। यहां कुछ तरीके दिये गये हैं, जिससे ऐसा पूरी तरह से किया जा सकता है:

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– बाहर जाते समय धूप का चश्मा पहनें।

– बार-बार हाथ धोएं और कोशिश करें कि आंखें न मलें।

– हाइड्रेटेड रहें क्योंकि यह आंसू बनने में मदद करता है।

– आंखों की रोशनी बढ़ाने के लिए आई ड्रॉप का इस्तेमाल करें।

– ओमेगा 3 फैटी एसिड से भरपूर स्वस्थ डाइट लें।

– कॉन्टैक्ट लेंस का उपयोग करने से बचें और यदि आवश्यक हो, तो डिस्पोजेबल लेंस का विकल्प चुनें।

सर्दियों के महीनों में प्रदूषण के नियंत्रण में आने के कोई संकेत नहीं होने के कारण, लोगों को वायु प्रदूषण के हानिकारक प्रभावों और अपनी संपूर्ण सेहत की रक्षा के तरीकों के बारे में अधिक जागरूक होने की जरूरत है।

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